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​नियमों की अर्थी पर ‘अपनों’ की चांदी: विदिशा इंजीनियरिंग कॉलेज में बड़ा घोटाला! जांच एजेंसियों की चुप्पी के बाद अब न्यायपालिका की शरण में शिकायतकर्ता।

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S.A.T.I. विदिशा – लोकधन की लूट या प्रशासनिक मिलीभगत? अब ‘माननीय न्यायालय’ तय करेगा करोड़ों के घोटाले का अंजाम!

विदिशा। प्रतिष्ठित सम्राट अशोक तकनीकी संस्थान (S.A.T.I.) में ग्रांट और एरियर्स वितरण के नाम पर चल रहे ‘वित्तीय खेल’ ने अब एक निर्णायक मोड़ ले लिया है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध मोर्चा खोलने वाले सामाजिक कार्यकर्ता श्री चेतन सिंह राजपूत ने प्रदेश की तमाम जांच और अपराध नियंत्रण एजेंसियों के दरवाजे खटखटाने के बाद, अब न्याय के लिए ‘न्यायालय’ की शरण लेने का मन बना लिया है।

 शासन की जांच एजेंसियों की चुप्पी पर सवाल

शिकायतकर्ता द्वारा मध्य प्रदेश शासन के वित्त विभाग, तकनीकी शिक्षा विभाग, स्थानीय निधि संपरीक्षा और आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) जैसी समस्त महत्वपूर्ण एजेंसियों को पुख्ता साक्ष्यों के साथ शिकायतें प्रेषित की जा चुकी हैं। बावजूद इसके, दोषियों पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई न होना प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़े करता है।

शिकायतकर्ता का संकल्प: “हमने सरकार की हर उस एजेंसी को आगाह कर दिया है जो भ्रष्टाचार रोकने के लिए जिम्मेदार है। यदि शासन-प्रशासन इस सुनियोजित लूट पर मौन रहता है, तो हमारा अगला कदम माननीय उच्च न्यायालय में याचिका दायर करना होगा। लोकधन की इस बंदरबाँट को हम हर हाल में रोकेंगे।”

 

भ्रष्टाचार की ‘पटकथा’: नियमों की धज्जियाँ और अपात्रों पर मेहरबानी

संस्थान के भीतर चल रही विसंगतियों की सूची लंबी और चौंकाने वाली है, जिसका खुलासा RTI के दस्तावेजों ने किया है:

* अपात्रों का ‘राज्याभिषेक’: 01/04/2000 के पूर्व जो कर्मचारी नियमित नहीं थे, उन्हें भी चोर दरवाजे से सरकारी ग्रांट का लाभ देने की तैयारी है।

* पदों का मायाजाल: मैनेजमेंट कोटे के पदों को सरकारी पद बताकर शासन के खजाने में सेंध लगाई जा रही है।

* संचालक के दागी रिकॉर्ड पर पर्दा: संस्थान के वर्तमान संचालक डॉ. वाई. के. जैन और उनके कुछ सहयोगी, जो पूर्व में 3 वर्षों तक सेवा से पृथक रहे थे, उन्हें भी नियम विरुद्ध तरीके से एरियर के लाभ में शामिल किए जाने के आरोप हैं।

* 89 दिनों का ‘जादू’: मात्र 89 दिनों की अल्पकालिक सेवा को नियमित सेवा मानकर एरियर की गणना की गई है—नियमों का ऐसा मखौल शायद ही कहीं और देखने को मिले।

यह केवल शिकायत नहीं, एक बड़ा जन-आंदोलन है

यह मामला अब केवल एक संस्थान या व्यक्ति तक सीमित नहीं है। इसमें संस्थान के कई सेवानिवृत्त और कार्यरत पात्र कर्मचारी भी शामिल हो गए हैं, जिनका हक मारकर अपात्रों की झोली भरी जा रही है। पात्र कर्मचारियों का आरोप है कि उनका एरियर जानबूझकर तैयार नहीं किया गया, जबकि ‘खास’ लोगों के लिए नियम बदल दिए गए।

अगला पड़ाव: न्याय का मंदिर

जब प्रशासनिक गलियारों से न्याय की उम्मीद धुंधली पड़ने लगती है, तो अंतिम आस ‘न्यायपालिका’ ही होती है। शिकायतकर्ता और पीड़ित कर्मचारियों ने स्पष्ट कर दिया है कि करोड़ों रुपये के इस संभावित घोटाले को रोकने के लिए वे अब कानूनी लड़ाई लड़ेंगे।

 

Tahalka Bharat
Author: Tahalka Bharat

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