सरकारी ‘लालच’ पर भारी पड़ा बाज़ार: शराब दुकानों के लिए तरसी सरकार, अब ‘डिस्काउंट’ पर बिकेगा नशा!
भोपाल | मध्यप्रदेश सरकार की नई आबकारी नीति 2026-27 अपने आगाज से पहले ही लड़खड़ाती नजर आ रही है। खजाने को भरने की भारी चाहत में दुकानों की कीमतों में जो 20 प्रतिशत का ‘करंट’ लगाया गया था, उसने ठेकेदारों को ऐसा डराया कि प्रदेश की करीब 42 प्रतिशत दुकानों पर ताले लटकने की नौबत आ गई है। अब आनन-फानन में साख बचाने के लिए सरकार ने बैकडोर से कीमतों में कटौती का दांव खेला है।
20% की ‘जंप’ पड़ी भारी, 1500 दुकानें अब भी लावारिस
मध्यप्रदेश की कुल 3553 शराब दुकानों में से 1500 दुकानों को पांच दौर की नीलामी के बाद भी कोई खरीदार नसीब नहीं हुआ है। आलम यह है कि मिनी मुंबई कहे जाने वाले इंदौर की 38 प्राइम दुकानें भी धूल फांक रही हैं। सरकार ने राजस्व का जो 20 हजार करोड़ का पहाड़ खड़ा किया था, उसे पाने के चक्कर में नीति ऐसी बनाई कि ठेकेदार मैदान छोड़कर भाग खड़े हुए। अब तक केवल 2050 दुकानें ही नीलाम हो पाई हैं, जिनसे करीब 11 हजार करोड़ का राजस्व मिल सका है। शेष 9 हजार करोड़ का लक्ष्य अभी कोसों दूर है।
नया पैंतरा: ‘कीमत कम नहीं की, बस कम बोली की छूट दी’
31 मार्च की डेडलाइन सिर पर है और 1 अप्रैल से नए ठेके लागू होने हैं। हार मानकर अब शासन ने पहली बार सिस्टम में ऐसा बदलाव किया है जिसे ‘मजबूरी का डिस्काउंट’ कहा जा रहा है। सरकार ने सीधे तौर पर रेट कम करने के बजाय ठेकेदारों को 4 प्रतिशत कम बोली लगाने की छूट दे दी है।
गणित समझिए: अगर किसी दुकान का रिजर्व प्राइस 1 करोड़ रुपये है, तो अब ठेकेदार 96 लाख रुपये की बोली भी लगा सकता है। पहले सिस्टम में तय कीमत से एक रुपया भी कम कोट करने का विकल्प नहीं था।
कल छठे चरण की अग्निपरीक्षा
कल यानी सोमवार को छठे चरण की नीलामी होने जा रही है। अधिकारियों को उम्मीद है कि इस 4 प्रतिशत की ‘रियायत’ के बाद ठेकेदार लौट आएंगे। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या यह छोटी सी छूट उन छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों की दुकानों को बिकवा पाएगी, जहाँ 20 प्रतिशत की वृद्धि ने पहले ही मुनाफे की गणित बिगाड़ दी है?
मुख्य आंकड़े एक नज़र में:
कुल दुकानें: 3553
बिन बिकी दुकानें: ~1500 (42% से अधिक)
राजस्व लक्ष्य: 20,000 करोड़ रुपये
अब तक प्राप्त: ~11,000 करोड़ रुपये
नई रियायत: बेस प्राइस से 4% कम पर टेंडर डालने की छूट










