भोपाल। शिक्षा को व्यापार और बच्चों के भविष्य को मुनाफे का जरिया बना दिया गया है। सत्र 2026-27 शुरू होने से पहले ही प्रदेश के कई स्कूलों में किताबों की खरीद-बिक्री अवैध रूप से शुरू कर दी गई, जबकि सरकार के स्पष्ट निर्देश हैं कि किताबों की सूची और खरीद प्रक्रिया पोर्टल पर अपलोड होने के बाद ही लागू की जाए।
हैरानी की बात यह है कि अभी तक सरकारी पोर्टल पर कोई भी सूची अपलोड नहीं की गई, जबकि नियमों के अनुसार 31 दिसंबर तक ही प्रक्रिया पूरी होनी थी। इसके बावजूद स्कूल प्रबंधन और शिक्षा माफिया की मिलीभगत से 4 से 5 बड़े दुकानदारों को फायदा पहुंचाने की साजिश खुलेआम चल रही है।
मोनोपॉली थोपने का खेल, 90% किताबों में काला बाजारी
सूत्रों के अनुसार स्कूलों में एक ही दुकानदार की किताबें खरीदने का दबाव बनाया जा रहा है। अभिभावकों को विकल्प नहीं दिया जा रहा, जिससे मोनोपॉली को बढ़ावा दिया जा रहा है।
स्थिति यह है कि 90 प्रतिशत किताबों में काला बाजारी हो रही है और एमआरपी से कहीं ज्यादा दाम वसूले जा रहे हैं।
शिकायतें हुईं, लेकिन कार्रवाई शून्य
मामले को लेकर जिला शिक्षा अधिकारी से लेकर शिक्षा मंत्री तक शिकायतें की गईं, लेकिन आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इससे साफ है कि या तो पूरा सिस्टम इस खेल में शामिल है या फिर जानबूझकर आंखें मूंदी जा रही हैं।
हिंदू महासभा का विरोध, पत्रकार वार्ता में बड़ा खुलासा
इस गंभीर घोटाले के खिलाफ हिंदू महासभा भोपाल ने भी विरोध दर्ज कराया। वहीं नेशनल मीडिया स्टेट हेड और
मध्य प्रदेश पालक प्रदेश अध्यक्ष कमल विश्वकर्मा ने पत्रकार वार्ता कर कमीशनखोरी में लिप्त लोगों के नाम पर दुकानदारों का खुलासा किया।
पत्रकार वार्ता में स्पष्ट कहा गया कि किताबों के नाम पर मोटा कमीशन, सेटिंग और भ्रष्टाचार चल रहा है, जिसका सीधा नुकसान बच्चों और अभिभावकों को उठाना पड़ रहा है।
सवाल सीधे सरकार से
क्या शिक्षा विभाग कुछ चुनिंदा दुकानदारों के लिए काम कर रहा है?
नियम तोड़ने वाले स्कूलों पर कार्रवाई क्यों नहीं?
बच्चों की पढ़ाई को मुनाफे का धंधा बनाने वालों को कब सजा मिलेगी?
जब तक इस किताब घोटाले पर सख्त कार्रवाई नहीं होती, तब तक यह सवाल सरकार के माथे पर कलंक बना रहेगा।










