खाकी की आड़ में ‘कुबेर’ का खेल : 100 करोड़ के काले साम्राज्य का अंत…!
भोपाल – जब रक्षक ही भक्षक बन जाए और वर्दी की जेबें तिजोरियों से बड़ी हो जाएं, तो सौरभ शर्मा जैसे “करोड़पति कॉन्स्टेबल” पैदा होते हैं। जिस विभाग का काम नियम और कानून लागू करना था, उसी के एक सिपाही ने भ्रष्टाचार की ऐसी ‘स्वर्ण लंका’ खड़ी की, जिसे देखकर आज पूरा देश स्तब्ध है।
बेनामी संपत्ति का ‘मास्टरमाइंड’ और उसका मोहरा
आयकर विभाग की एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी ने स्पष्ट कर दिया है कि यह 100 करोड़ का सोना और कैश किसी मेहनत की कमाई का हिस्सा नहीं, बल्कि बेनामी पाप है।
* असली मालिक: पूर्व आरटीओ कॉन्स्टेबल सौरभ शर्मा।
* बेनामीदार (मोहरा): उसका सहयोगी चेतन सिंह गौर।
अथॉरिटी ने भोपाल की बेनामी निषेध इकाई (BPU) की कार्रवाई पर मुहर लगाते हुए इस विशाल संपत्ति को सरकारी खजाने में जमा करने का आदेश दिया है। यानी, जनता की गाढ़ी कमाई जो भ्रष्टाचार के रास्ते लूटी गई थी, वह अब वापस वहीं जाएगी जहाँ उसका हक है।
आधी रात, एक इनोवा और करोड़ों का ‘पीला पाप’
भ्रष्टाचार की यह दास्तां किसी फिल्मी थ्रिलर से कम नहीं है। दिसंबर 2024 की वह सर्द रात याद कीजिए, जब भोपाल के मेंडोरी में एक इनोवा कार पकड़ी गई थी। उस गाड़ी के भीतर जो मिला, उसने जांच एजेंसियों के भी होश उड़ा दिए:
* 51.8 किलो सोना: जो एक सिपाही की पूरी ज़िंदगी की वैध कमाई से भी हज़ारों गुना ज़्यादा है।
* 11 करोड़ रुपए नकद: जिसे ठिकाने लगाने की फिराक में ये भ्रष्टाचार के खिलाड़ी अंधेरे का फायदा उठा रहे थे।
तीखा सवाल: एक सिपाही के पास इतना पैसा कहाँ से?
यह मामला सिर्फ एक सौरभ शर्मा का नहीं है, बल्कि उस सिस्टम की सड़न का है जो एक कॉन्स्टेबल को 100 करोड़ का मालिक बनने का मौका देती है। क्या यह संभव है कि ऊपरी संरक्षण के बिना एक छोटा कर्मचारी इतना बड़ा नेटवर्क चला ले?
लोकायुक्त, ईडी (ED) और आयकर विभाग की इस साझा कार्रवाई ने यह तो साफ कर दिया है कि “पाप का घड़ा” एक न एक दिन भरता जरूर है, लेकिन सवाल अब भी बरकरार है—ऐसे और कितने ‘सौरभ’ सिस्टम की जड़ों को खोखला कर रहे हैं?
निष्कर्ष: सरकारी खजाने में जमा होने वाला यह 100 करोड़ रुपया भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़ी जीत है, लेकिन यह उन लोकसेवकों के लिए एक चेतावनी भी है जो जनता की सेवा के बजाय अपनी तिजोरियां भरने को प्राथमिकता देते हैं।










