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​”मज़दूरों की ‘अर्थी’ पर सत्ता का ‘अभिनंदन’: 5600 फैक्ट्रियां वेंटिलेटर पर, 20 हज़ार नौकरियां खा गया माला-माइक का मोह!”

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विशेष खबर – औद्योगिक ‘डेथ वारंट’ पर दस्तखत, माला-माइक में मगन सत्ता…!

इंदौर/पीथमपुर। मध्य प्रदेश के औद्योगिक गलियारों से आई एक रिपोर्ट ने प्रदेश की आर्थिक सेहत की पोल खोलकर रख दी है। वैश्विक युद्ध की मार और सरकार की उदासीनता ने एशिया की सबसे बड़ी औद्योगिक नगरी पीथमपुर सहित पूरे प्रदेश को एक ऐसे अंधेरे मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहाँ से तबाही साफ नज़र आ रही है।

आंकड़ों में तबाही : मौत के मुहाने पर उद्योग

ज़मीन पर हकीकत किसी डरावनी फिल्म जैसी है। आँकड़े गवाही दे रहे हैं कि मध्य प्रदेश की अर्थव्यवस्था ‘वेंटिलेटर’ पर है:

5,600 फैक्ट्रियां: बंद होने की कगार पर पहुँच चुकी हैं।

  20,000 कर्मचारी: एक झटके में सड़क पर आ गए, इनकी नौकरियां खत्म कर दी गई हैं।

  30,000 परिवार: इनकी सैलरी आधी कर दी गई है, जिससे घर चलाना दूभर हो गया है।

 शिफ्टों का सन्नाटा: जहाँ कभी 3 शिफ्टों में मशीनों का शोर गूंजता था, वहाँ अब बमुश्किल 1 शिफ्ट का काम बचा है।

सत्ता का ‘अंधा’ मोह: अभिनंदन या अंतिम संस्कार?

विचित्र विरोधाभास देखिए—एक तरफ पीथमपुर के कारखानों में ताले लटक रहे हैं, दूसरी तरफ सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग ‘अभिनंदन, मंच, माला और माइक’ की दुनिया में खोए हुए हैं। उन्हें न उन 20 हज़ार युवाओं के भविष्य की चिंता है जिनकी आँखों की चमक छिन गई, न उन हज़ारों परिवारों की जिनकी थाली आधी हो गई।

“जब उद्योग दम तोड़ रहे हैं, तब हुक्मरानों का स्वागत-सत्कार और आत्ममुग्धता में डूबे रहना केवल शर्मनाक नहीं, बल्कि प्रदेश के भविष्य के साथ जघन्य अपराध है।”

गायब है जिम्मेदारी का एहसास

पीथमपुर और इंदौर के औद्योगिक क्षेत्रों में प्रतिदिन मज़दूरों की छंटनी के दृश्य आम हो गए हैं। लेकिन मजाल है कि किसी जिम्मेदार के माथे पर चिंता की लकीर दिखे।

कहाँ है प्रभावी योजना? 

कहाँ है उद्योगों को बचाने का रोडमैप? 

कहाँ है वह संवेदनशीलता जिसका ढोल मंचों से पीटा जाता है?

 खिलवाड़ बंद करो!

यह संवेदनहीनता प्रदेश को उस गर्त में ले जा रही है जहाँ से वापसी मुमकिन नहीं होगी। उद्योगों का बंद होना केवल व्यापार का नुकसान नहीं है, बल्कि एक पूरी पीढ़ी के भरोसे का कत्ल है। अगर सरकार अब भी अपनी चमचमाती महफिलों से बाहर निकलकर इन 5,600 फैक्ट्रियों की चिमनियों का धुआं बहाल नहीं कर पाई, तो जनता की यह खामोशी जल्द ही आक्रोश के बड़े विस्फोट में बदल जाएगी।

सवाल अब भी वही है: साहब, क्या आपकी मालाओं की महक उन हज़ारों चूल्हों की राख को ढँक पाएगी जो काम न होने की वजह से बुझ गए हैं?

Tahalka Bharat
Author: Tahalka Bharat

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