भोपाल एम्स में महाघोटाला: ₹14 की ट्यूब ₹943 में खरीदने पर वित्त नियमों (GFR) की खुली धज्जियां, विपक्ष का मोदी सरकार पर बड़ा हमला— ‘देश में बीजेपी है तो लूट की गारंटी है’
भोपाल (मध्य प्रदेश) : देश के प्रमुख चिकित्सा संस्थानों में शुमार मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में दवाओं और सर्जिकल उपकरणों की खरीद में एक बहुत बड़ा वित्तीय फर्जीवाड़ा सामने आया है। आम गरीबों को सस्ती और सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं देने के नाम पर स्थापित इस संस्थान में किस हद तक सरकारी धन की लूट मची है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जहां एक तरफ आम जनता महंगाई से त्रस्त है, वहीं भोपाल एम्स के भीतर एक साधारण सी मेडिकल ट्यूब पर 6500 प्रतिशत से अधिक की मुनाफाखोरी की गई है।
सामने आई आंतरिक समिति की रिपोर्ट के अनुसार, जिस 200 सेंटीमीटर की हाई-प्रेशर एक्सटेंशन ट्यूब की बाजार या अन्य अनुबंधित दर मात्र 14 रुपये 27 पैसे थी, उसे अमृत फार्मेसी से सीधे 943 रुपये 49 पैसे की भारी-भरकम कीमत पर खरीदा गया। इस एक ही खरीद में प्रति ट्यूब 929 रुपये 22 पैसे अधिक चुकाए गए। इस चौंकाने वाले खुलासे के बाद से स्वास्थ्य विभाग से लेकर प्रशासनिक गलियारों तक हड़कंप मच गया है।
मुख्य 5 बिंदु जिससे यह खुलासा स्पष्ट भ्रष्टाचार को दर्शाता है :
- ₹14.27 की मेडिकल ट्यूब के लिए चुपचाप चुकाए गए ₹943.49
- 325 से अधिक दवाओं और सर्जिकल आइटम्स की कीमतों में भारी व संदिग्ध अंतर
- अनुबंधित दरों से 500% से लेकर 6500% तक अधिक कीमत पर की गई सप्लाई
- अनियमित और संदेहास्पद खरीद के कारण एम्स का कुल बजट ₹145 करोड़ से बढ़कर सीधे ₹245 करोड़ पर पहुंचा
- विपक्ष ने सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा— ‘जब तक देश में मोदी और बीजेपी है, तब तक हर तरह का भ्रष्टाचार संभव है’
वित्तीय नियम (GFR) और खरीद नियमावली क्या कहती है? (नियमों का खुला उल्लंघन)
इस मामले के सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या सरकारी खरीद के बुनियादी नियमों को ताक पर रखकर यह खेल खेला गया? वित्तीय विशेषज्ञों और नियमों के जानकारों के अनुसार, इस खरीद ने केंद्र सरकार के वित्तीय प्रावधानों की धज्जियां उड़ा दी हैं:
- सामान्य वित्तीय नियम (GFR 2017) के नियम-149 और 144 की अनदेखी: भारत सरकार के नियमों के मुताबिक सरकारी विभागों और अस्पतालों के लिए यह अनिवार्य है कि वे अधिकांश वस्तुएं GeM (Government e-Marketplace) पोर्टल या पारदर्शी प्रतिस्पर्धी निविदाओं (Competitive Tenders) के माध्यम से खरीदें, जहां ‘मूल्य की तर्कसंगतता’ (Reasonability of Rates) सुनिश्चित करना खरीद अधिकारी की व्यक्तिगत जिम्मेदारी होती है। इसके बावजूद बाजार दरों से 6500% ज्यादा दाम चुकाना GFR के वित्तीय अनुशासन के सिद्धांतों का खुला उल्लंघन है।
- एम्स परचेस मैनुअल और वित्तीय औचित्य (Financial Propriety): एम्स के आंतरिक खरीद नियमों के तहत किसी भी वस्तु को उसकी वास्तविक बेंचमार्क कीमत से अत्यधिक दरों पर नहीं खरीदा जा सकता। नियम यह भी कहते हैं कि यदि एक ही सामग्री अन्य अनुबंधित सप्लायरों के पास ₹14 में उपलब्ध है, तो उसे अन्य माध्यम से सैकड़ों गुना महंगे दामों पर खरीदने से पहले ‘वित्तीय सहमती’ (Financial Concurrence) और विशेष अनुमति लेनी होती है। यहाँ नियमों को दरकिनार कर संस्था को करोड़ों रुपये की चपत लगाई गई।
“जब तक देश में मोदी और बीजेपी है, तब तक हर तरह का भ्रष्टाचार संभव है”: विपक्ष का तीखा प्रहार
इस महाघोटाले के उजागर होने के बाद मध्य प्रदेश सहित राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक घमासान मच गया है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने केंद्र की भारतीय जनता पार्टी (BJP) सरकार और स्वास्थ्य तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
विपक्ष के वरिष्ठ नेताओं ने आक्रामक तेवर अपनाते हुए कहा है कि “देश में जब तक बीजेपी और मोदी सरकार का राज है, तब तक हर तरह का भ्रष्टाचार और जनता के पैसों की खुली लूट संभव है।” विपक्ष ने तंज कसते हुए कहा कि अमृत फार्मेसी जैसी योजनाओं का मकसद मरीजों को राहत देना था, लेकिन भ्रष्टाचार के चश्मे से इन्हें मुनाफाखोरी का अड्डा बना दिया गया है।
कांग्रेस पार्टी ने मांग की है कि एम्स के इस बढ़ते हुए 145 करोड़ से 245 करोड़ के बजट और इस पूरी खरीद प्रक्रिया की एक स्वतंत्र उच्चस्तरीय या न्यायिक जांच बैठाकर उन बड़े चेहरों को बेनकाब किया जाए, जिनकी सरपरस्ती में यह घोटाला फला-फूला है।









