पीएम मोदी के ‘दिमागी नक्सल’ वाले बयान पर छिड़ा सियासी संग्राम, पवन खेड़ा और विपक्ष का तीखा पलटवार
नई दिल्ली:
लाल किले की प्राचीर से स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिए गए ‘दिमागी नक्सल’ (Intellectual Naxals) वाले बयान के बाद देश के राजनीतिक गलियारों में भारी बवाल खड़ा हो गया है। जहां प्रधानमंत्री मोदी ने हथियारबंद नक्सलवाद के खात्मे का दावा करते हुए वैचारिक व बौद्धिक रूप से समाज को गुमराह करने वाले ‘दिमागी नक्सलियों’ को पहचानने और उन्हें अलग-थलग करने की बात कही, वहीं विपक्ष ने इसे लोकतांत्रिक असहमति और युवाओं की आवाज को दबाने की कोशिश करार दिया है।
क्या कहा था प्रधानमंत्री मोदी ने?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि सरकार ने जंगलों से बंदूकधारी नक्सलवाद का सफाया कर दिया है, लेकिन अब एक नया खतरा ‘दिमागी नक्सलवाद’ के रूप में सामने आ रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि माओवादी सोच रखने वाले लोग वर्षों से व्यवस्था और नीति-निर्धारण से जुड़ी कमेटियों में बैठकर युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करते रहे हैं। उन्होंने देशवासियों से अपील की कि ऐसे लोगों को चिन्हित कर समाज से अलग-थलग किया जाए।
पवन खेड़ा और कांग्रेस का तीखा हमला
प्रधानमंत्री के इस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब भी देश के किसान, युवा या छात्र अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरते हैं और सरकार से सवाल करते हैं, तो उन्हें तुरंत ‘नक्सली’ या किसी न किसी टैग से नवाज दिया जाता है।
खेड़ा ने कटाक्ष करते हुए कहा कि जब युवा अपनी मांगों को लेकर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करते हैं और सवाल पूछते हैं, तो सरकार दबाव में आकर कदम उठाती है—चाहे वह परीक्षाओं में गड़बड़ी पर शिक्षा मंत्री का इस्तीफा हो या किसानों की मांगें मानना। अगर वे सभी ‘नक्सली’ हैं, तो फिर सरकार उनकी बातें सुनकर फैसले क्यों बदलती है?
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने भी इस शब्दावली को सरकार की ‘हताशा’ करार देते हुए कहा कि पहले ‘अर्बन नक्सल’ और अब ‘दिमागी नक्सल’ जैसे नए-नए तमगे देकर सरकार से सवाल पूछने वाले हर नागरिक, छात्र और विपक्ष की आवाज को दबाने का प्रयास किया जा रहा है।
पुराने बयानों से जुड़ती कड़ियां
सूत्रों और राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी पहले भी ‘अर्बन नक्सल’ और ‘आंदोलनजीवी’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर विरोधी विचारधारा पर निशाना साधते रहे हैं। हालांकि, इस बार ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल कर युवाओं और वैचारिक सहयोगियों को मुख्यधारा में लाने की जो बात कही गई है, उसने राजनीति में एक नया मोड़ ला दिया है।
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सरकार का बचाव करते हुए स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री का इशारा विपक्ष पर नहीं, बल्कि उन तत्वों पर था जो संविधान को नहीं मानते और देश को तोड़ने की मंशा रखते हैं।
आगामी दिनों में गरमाएगा मुद्दा
स्वतंत्रता दिवस के इस राष्ट्रीय मंच से आए इस बयान ने सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच की खाई को और चौड़ा कर दिया है। अब देखना होगा कि आने वाले दिनों में यह जुबानी जंग क्या रूप लेती है और क्या विपक्ष इस मुद्दे को संसद से लेकर सड़क तक ले जाकर बड़ा राजनीतिक आंदोलन बनाएगा।










