
भोपाल। सिंगरौली के जंगल इन दिनों केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि संघर्ष, पीड़ा और प्रतिरोध के जीवंत प्रतीक बन गए हैं। मशीनों की तेज गड़गड़ाहट उस त्रासदी की गवाह है जो न केवल पर्यावरण को उजाड़ रही है, बल्कि आदिवासी अस्मिता, सांस्कृतिक विरासत और पीढ़ियों से संरक्षित प्राकृतिक धरोहर पर गहरा घाव छोड़ रही है।

स्थानीय लोगों के अनुसार, कटने के लिए चिह्नित किए गए हजारों पेड़ ऐसे दिखाई देते हैं जैसे कतार में खड़े होकर मौत का इंतज़ार कर रहे हों। यही जंगल कभी उन पूर्वजों ने रोपे थे, जिनकी मेहनत, संवेदना और प्रकृति के प्रति सम्मान आज भी इन घाटियों की हवा में दर्ज है। यही वजह है कि यह केवल पेड़ों की लड़ाई नहीं, बल्कि अपनी पहचान, अपने इतिहास और अपने भविष्य की लड़ाई भी है।

आदिवासी समुदाय का आरोप है कि जमीनें ज़बरन अधिग्रहित की जा रही हैं। कागज़ों पर सहमति का दिखावटी खेल रचा जा रहा है, परंतु वास्तविकता में लोगों को धमकाकर, दबाव डालकर दस्तख़त करवाए जा रहे हैं। विरोध की आवाज़ों को दबाने के लिए प्रशासन और पुलिस का मजबूत घेरा खड़ा कर दिया गया है, ताकि सच बाहर न निकल सके। लेकिन समुदाय स्पष्ट है—दीवारें प्रतिरोध को रोक नहीं सकतीं।

इसी पृष्ठभूमि में कांग्रेस की फैक्ट-फाइंडिंग कमेटी ने आज सिंगरौली पहुंचकर स्थिति का प्रत्यक्ष निरीक्षण किया। कमेटी के सदस्यों ने स्थानीय लोगों से बातचीत कर उन तथ्यों को सामने लाया जिन्हें क्षेत्र के लोग महीनों से उजागर करने की कोशिश कर रहे थे, परंतु सत्ता तंत्र द्वारा लगातार दबा दिया गया।

स्थानीय निवासियों का कहना है कि यह संघर्ष किसी राजनैतिक दल का नहीं, बल्कि जनजीवन और पर्यावरण की रक्षा का है। उनका सवाल साफ है—क्या विकास के नाम पर अडानी जैसे बड़े कॉरपोरेट की जेबें भरने के लिए जंगलों, घरों और इतिहास को मिटा दिया जाएगा?
सिंगरौली के इस संघर्ष में दो तस्वीरें साफ दिखती हैं—एक तरफ हज़ारों पेड़ों पर लिखे नंबर और दूसरी तरफ उन लोगों की आँखों में लिखा दर्द, जिनके जीवन का अर्थ ही जंगल है। सवाल यही है कि सरकार किसके लिए काम कर रही है—जनता के लिए या पूंजी के लिए?

सिंगरौली के जंगलों की पुकार सिर्फ एक क्षेत्रीय मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए पर्यावरण संरक्षण, आदिवासी अधिकार और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की पारदर्शिता का बड़ा सवाल है।










