हंगामे की भेंट चढ़ा बजट सत्र : राज्यपाल के अभिभाषण में दावों की गूँज, विपक्ष का तीखा प्रहार
संपादक रानू शर्मा
भोपाल। मध्यप्रदेश विधानसभा के बजट सत्र का आगाज़ उम्मीद के मुताबिक ही हुआ—शांति से कम और शोर-शराबे से ज्यादा। सोमवार को सदन की कार्यवाही जैसे ही शुरू हुई, मर्यादा और परंपराओं के बीच सियासत की कड़वाहट साफ नजर आई। पूरे छंदों में ‘वंदे मातरम्’ के गायन से जिस गरिमा की शुरुआत हुई थी, वह कुछ ही पलों में विपक्ष के नारों और शोरगुल की भेंट चढ़ गई।
विकास के दावों पर ‘हंगामे’ का ग्रहण
राज्यपाल मंगु भाई पटेल जब सरकार की उपलब्धियों का पुलिंदा पढ़ रहे थे, तब सदन का माहौल किसी अखाड़े से कम नहीं था। एक तरफ राज्यपाल सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं और ‘संकल्प पत्र 2023’ के वादों पर हुई प्रगति का गुणगान कर रहे थे, तो दूसरी तरफ विपक्ष उनके हर दावे को शोर के जरिए चुनौती दे रहा था।
राज्यपाल के अभिभाषण की मुख्य बातें:
* विकास का ढिंढोरा: सरकार की पुरानी उपलब्धियों और भविष्य के ‘स्वर्ण लक्ष्यों’ का खाका।
* संकल्प पत्र की सुस्त चाल: 2023 के वादों पर अब तक हुए कार्यों का महिमामंडन।
* बदलाव का दावा: योजनाओं से आए कथित सामाजिक-आर्थिक सुधारों का उल्लेख।
सदन में ‘सियासी विलाप’ और ‘सन्नाटा’
विपक्ष के भारी हंगामे के चलते सदन की कार्यवाही को अगले दिन तक के लिए स्थगित करना पड़ा। यह साफ है कि सत्तापक्ष जहाँ अपनी पीठ थपथपाने में व्यस्त है, वहीं विपक्ष ने पहले ही दिन तेवर दिखाकर स्पष्ट कर दिया है कि वह सरकार को इतनी आसानी से ‘वॉकओवर’ देने के मूड में नहीं है।
हालांकि, इस गहमागहमी के बीच सदन ने एक पल के लिए अपनी संवेदनाएं भी दिखाईं। दिवंगत नेताओं और हस्तियों को श्रद्धांजलि दी गई, जहाँ पक्ष और विपक्ष दोनों ने एक सुर में शोक व्यक्त किया। लेकिन यह एकजुटता महज कुछ मिनटों की थी; जैसे ही श्रद्धांजलि खत्म हुई, सियासी दांव-पेंच फिर शुरू हो गए।
निष्कर्ष : जनता के मुद्दों पर कब होगी बात?
बजट सत्र का पहला दिन यह बताने के लिए काफी है कि आने वाले दिनों में जनता के असली मुद्दों से ज्यादा ‘सियासी शक्ति प्रदर्शन’ देखने को मिलेगा। सरकार जहाँ कागजी आंकड़ों में विकास खोज रही है, वहीं विपक्ष का हंगामा इसे पटरी से उतारने की कोशिश में है। सवाल यह है कि क्या इस शोर-शराबे के बीच मध्यप्रदेश की जनता की जरूरतों का बजट सही मायने में चर्चा का विषय बन पाएगा?










