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“नागलवाड़ी में ₹27,746 करोड़ का ‘चुनावी दांव’ : आंकड़ों की बारिश से क्या किसान के सूखे जख्म भर पाएंगे मुख्यमंत्री?”

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बड़वानी से बड़ा ऐलान : करोड़ों की ‘कृषि कैबिनेट’ या चुनावी बिसात?

संपादक रानू शर्मा…!

मध्य प्रदेश की राजनीति का केंद्र आज मालवा-निमाड़ का नागलवाड़ी रहा, जहाँ मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में ‘कृषि कैबिनेट’ का आयोजन किया गया। सरकारी दावों की चमक और ₹27,746 करोड़ के भारी-भरकम आंकड़ों के बीच इस बैठक को किसान कल्याण का ‘महाकुंभ’ बताया जा रहा है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या ये निर्णय ज़मीन पर फसल बनकर लहलहाएंगे या सिर्फ सरकारी फाइलों में धूल फांकेंगे?

आंकड़ों का मायाजाल : 16 योजनाएं और 27 हजार करोड़

मुख्यमंत्री ने बड़े ताम-झाम के साथ घोषणा की कि कृषि, उद्यानिकी, पशुपालन, मत्स्य कल्याण, सहकारिता और नर्मदा घाटी विकास जैसे 6 विभागों की 16 योजनाओं को हरी झंडी दे दी गई है। सरकार का दावा है कि इन प्रस्तावों के जरिए प्रदेश के अन्नदाता की तकदीर बदल जाएगी।

कैबिनेट के मुख्य बिंदु:

* बजट का भारी आवंटन: ₹27,746 करोड़ के व्यय की स्वीकृति।

* बहुआयामी फोकस: केवल खेती ही नहीं, बल्कि पशुपालन और मछली पालन को भी लाभ पहुंचाने का वादा।

नर्मदा घाटी विकास : सिंचाई परियोजनाओं को गति देने पर जोर।

घोषणावीर सरकार या असली सरोकार?

सरकार जब इतने बड़े आंकड़े पेश करती है, तो आम किसान के मन में कुछ चुभते हुए सवाल जरूर उठते हैं:

क्रियान्वयन की चुनौती: क्या यह ₹27,000 करोड़ वास्तव में किसान की जेब तक पहुंचेगा, या बिचौलियों और प्रशासनिक लेटलतीफी की भेंट चढ़ जाएगा?

पुराने वादों का क्या? खाद की किल्लत और फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के लिए सड़क पर उतरने वाले किसान को इन नई योजनाओं से तत्काल क्या राहत मिलेगी?

चुनावी गणित : नागलवाड़ी जैसी जगह पर कैबिनेट करना क्या वास्तव में विकेंद्रीकरण है या केवल वोट बैंक साधने की एक ‘पॉलिटिकल इवेंट मैनेजमेंट’?

 “हम कागजों पर योजनाएं नहीं बना रहे, बल्कि किसान के हाथ मजबूत कर रहे हैं।” — डॉ. मोहन यादव, मुख्यमंत्री

@दावों की कसौटी पर वक्त की मार

बड़वानी की धरती से लिए गए ये निर्णय सुनने में क्रांतिकारी लगते हैं। यदि सरकार इन 16 योजनाओं को पूरी ईमानदारी से लागू कर पाती है, तो निस्संदेह यह मध्य प्रदेश की कृषि व्यवस्था के लिए संजीवनी साबित होगी। लेकिन अगर ये केवल आगामी चुनावों के लिए बुने गए ‘सपनों के जाल’ निकले, तो किसान की नाराजगी सरकार को भारी पड़ सकती है।

अब देखना यह है कि डॉ. मोहन यादव का यह ‘नागलवाड़ी मॉडल’ किसानों के खेतों में खुशहाली लाता है या आंकड़ों की बाजीगरी बनकर रह जाता है।

 

Tahalka Bharat
Author: Tahalka Bharat

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