नई दिल्ली | जनसंसद में सिंगरौली से आए आदिवासी प्रतिनिधिमंडल से हुई मुलाक़ात ने देशभर में आदिवासी समाज पर हो रहे अन्याय की भयावह तस्वीर सामने रख दी। प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों की आंखों में आंसू थे और उनकी आवाज़ में वर्षों का दर्द। उन्होंने जंगलों की कटाई, पुश्तैनी ज़मीनों के छिनने और उजड़ती आजीविका की पीड़ा को शब्दों में बयां किया।

प्रतिनिधियों ने बताया कि यह केवल सिंगरौली की कहानी नहीं है, बल्कि वही अन्याय है जिसे देश के अलग-अलग हिस्सों में आदिवासी समुदाय झेल रहा है। इस अवसर पर कहा गया कि केंद्र की मोदी सरकार अपने चंद कॉरपोरेट मित्रों, विशेषकर अडानी जैसे उद्योगपतियों के हितों के लिए आदिवासी समाज को सुनियोजित ढंग से प्रताड़ित कर रही है।

देशभर में विकास के नाम पर जंगलों की अंधाधुंध कटाई की जा रही है। आदिवासियों की पुश्तैनी ज़मीनें छीनी जा रही हैं, जिससे उनकी रोज़ी-रोटी और पारंपरिक जीवनशैली पूरी तरह से तबाह हो रही है। प्रतिनिधिमंडल ने स्पष्ट किया कि आदिवासियों के लिए ज़मीन केवल संपत्ति नहीं, बल्कि माँ के समान होती है, और जंगल उनके लिए सिर्फ़ पेड़ नहीं, बल्कि आस्था और संस्कृति का केंद्र हैं।
आदिवासी समाज की आजीविका जंगलों से जुड़ी हुई है। मवेशियों की मौत, पानी और चारे की कमी तथा विस्थापन ने उनकी स्थिति को और भयावह बना दिया है। लेकिन सबसे बड़ा डर भविष्य को लेकर है। प्रतिनिधियों ने आशंका जताई कि अगर यही हाल रहा तो आने वाली पीढ़ियों का जीवन और बच्चों का भविष्य भी सुरक्षित नहीं रहेगा।
इस दौरान यह भी कहा गया कि आदिवासी इस देश के अतिक्रमणकारी नहीं हैं। वे भारत के पहले निवासी हैं और जल, जंगल व ज़मीन पर उनका अधिकार केवल नैतिक नहीं, बल्कि संवैधानिक भी है। भारत अपने मूल निवासियों को कुचलकर प्रगति नहीं कर सकता।
अंत में आदिवासी समाज के साथ मजबूती से खड़े रहने का संकल्प दोहराया गया और कहा गया कि उनकी ज़मीन, उनके जंगल और उनके बच्चों का भविष्य किसी भी कीमत पर छीने नहीं जाने दिए जाएंगे। यह संघर्ष केवल आदिवासियों का नहीं, बल्कि भारत की आत्मा और संवैधानिक मूल्यों को बचाने की लड़ाई है।










