श्योपुर में प्रशासनिक संवेदनहीनता की पराकाष्ठा : इंसाफ की आस में दम तोड़ने वाले बुजुर्ग के शव के साथ जय स्तंभ पर फूटा आक्रोश, तहसीलदार पर हत्या के केस की मांग!
श्योपुर।
मध्य प्रदेश के श्योपुर से प्रशासनिक संवेदनहीनता और सिस्टम के खोखलेपन की एक ऐसी रूह कंपा देने वाली तस्वीर सामने आई है, जिसने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया है। न्याय की गुहार लगाने कलेक्ट्रेट पहुंचे एक बुजुर्ग को जब इंसाफ की जगह सिर्फ तारीखें और अनदेखी मिली, तो मजबूरन उन्हें मौत को गले लगाना पड़ा। जनसुनवाई के दौरान जहर खाने वाले बुजुर्ग देवेंद्र गोयल की मौत के बाद अब श्योपुर सुलग उठा है। बुधवार को आक्रोशित अग्रवाल समाज के लोगों ने शव को शहर के मुख्य जय स्तंभ चौराहे पर रखकर उग्र धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया है।
प्रशासनिक तानाशाही और लापरवाही के खिलाफ इस आक्रोश की आग में घी डालने का काम स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने भी किया है। कांग्रेस विधायक बाबू जंडेल भी समाज के लोगों के साथ जमीन पर बैठ गए हैं और सरकार व स्थानीय प्रशासन के खिलाफ जमकर नारेबाजी हो रही है।
‘कुर्सी’ के अहंकार पर सवाल: तहसीलदार को हटाने और हत्या के मुकदमे की मांग
धरने पर बैठे समाज जनों का गुस्सा सातवें आसमान पर है। उन्होंने सीधे तौर पर तहसीलदार मनीषा मिश्रा को इस मौत का जिम्मेदार ठहराया है। समाज की दो टूक मांग है कि:
तत्काल बर्खास्तगी: तहसीलदार मनीषा मिश्रा को उनके पद से तुरंत हटाया जाए।
दोषियों पर एफआईआर: बुजुर्ग को आत्महत्या के लिए मजबूर करने के आरोप में तहसीलदार के खिलाफ हत्या का मुकदमा (धारा 302/306) दर्ज किया जाए।
मुआवजा: पीड़ित परिवार को तबाह होने से बचाने के लिए सरकार तुरंत 1 करोड़ रुपए की आर्थिक सहायता की घोषणा करे।
क्या है पूरा मामला? जब ‘जनसुनवाई’ ही बन गई मौत का कुआं
गौरतलब है कि मंगलवार सुबह करीब 11 बजे पीड़ित बुजुर्ग देवेंद्र गोयल कलेक्ट्रेट में आयोजित होने वाली ‘जनसुनवाई’ में अपनी फरियाद लेकर पहुंचे थे। अधिकारियों की चौखट पर माथा टेक-टेक कर थक चुके बुजुर्ग का आरोप था कि उनके सगे रिश्तेदारों ने ही उनकी दुकान पर अवैध कब्जा कर लिया है और उसे हड़प लिया है।
सिस्टम की क्रूरता देखिए…
हफ्तों-महीनों से अफसरों के चक्कर काट रहे देवेंद्र गोयल को जब मंगलवार को भी सिर्फ आश्वासन का झुनझुना थमाया गया और उनकी पीड़ा को अनसुना कर दिया गया, तो उनका सिस्टम पर से भरोसा उठ गया। कलेक्ट्रेट परिसर में ही उन्होंने प्रशासनिक अधिकारियों के सामने जहर गटक लिया।
कलेक्ट्रेट में हड़कंप मचने के बाद उन्हें गंभीर हालत में जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन तब तक जहर उनके जिस्म में फैल चुका था। आखिरकार, इलाज के दौरान उन्होंने दम तोड़ दिया।
खोखली जनसुनवाई: आखिर कब तक बलि चढ़ती रहेगी आम जनता?
यह घटना शिवराज और मोहन यादव सरकार के उन दावों की पोल खोलती है, जिसमें ‘जनसुनवाई’ को जनता की समस्याओं के त्वरित निवारण का जरिया बताया जाता है। हकीकत यह है कि यह जनसुनवाई अब महज एक कागजी औपचारिकता और ‘फोटो सेशन’ का अड्डा बनकर रह गई है, जहां गरीब और मजलूम अपनी चप्पलें घिस देता है, लेकिन वातानुकूलित कमरों में बैठे अफसरों के कान पर जूं तक नहीं रेंगती।
जय स्तंभ पर लगा यह जाम और गूंजते नारे सिर्फ एक देवेंद्र गोयल की मौत का मातम नहीं हैं, बल्कि यह उस मर चुके प्रशासनिक सिस्टम का जनाजा है, जो जिंदा इंसान को न्याय देने के बजाय उसकी लाश पर राजनीति करने का इंतजार करता है। जब तक तहसीलदार मनीषा मिश्रा और संबंधित अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई नहीं होती, तब तक श्योपुर का यह आक्रोश थमने वाला नहीं है।









