बड़वानी। निमाड़ की संस्कृति का सबसे बड़ा और जीवंत पर्व ‘गणगौर’ एक बार फिर अपनी पूरी भव्यता के साथ लौट आया है। श्रद्धा ऐसी कि हर घर मंदिर बन गया है और उत्साह ऐसा कि फिजाओं में लोकगीतों की मिठास घुल गई है। चैत्र कृष्ण एकादशी के शुभ मुहूर्त के साथ ही ‘माता की बाड़ी’ बोने की सदियों पुरानी परंपरा ने इस उत्सव का बिगुल फूंक दिया है।
भगवान शिव और माता पार्वती की भक्ति का यह संगम महज एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि निमाड़ की अस्मिता का प्रतीक है। पंडितों के मंत्रोच्चार के बीच बांस की टोकरियों में बोए गए ज्वारे, आने वाले नौ दिनों तक आस्था की धूप से सींचे जाएंगे।
21 मार्च : जब आस्था की अग्नि में तपेंगी मुरादें
इस वर्ष गणगौर की मुख्य पूजा 21 मार्च 2026 को होगी। यह वह दिन है जब सुहागिनें अपने पति की लंबी आयु और अखंड सौभाग्य के लिए कठिन नियमों का पालन करते हुए अपनी अटूट श्रद्धा को साकार करेंगी। समृद्धि की कामना और लोक परंपराओं का यह संगम यह बताने के लिए काफी है कि आधुनिकता के दौर में भी निमाड़ अपनी जड़ों को मजबूती से थामे हुए है।
पुजारी सिर्वी मंदिर शीतल भार्गव द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, निमाड़ क्षेत्र में गणगौर पर्व की तैयारियां प्रारंभ हो चुकी हैं और श्रद्धालु बड़ी संख्या में पूजा-अर्चना में शामिल हो रहे हैं।










