चुनावी जीत के खुमार से बाहर निकली भाजपा: अब ‘कैडर’ को धार देने की तैयारी या भीतर खाने छटपटाहट?
भोपाल। सत्ता के शिखर पर बैठने के बाद अक्सर संगठन में आने वाली सुस्ती को भांपते हुए भारतीय जनता पार्टी ने अपनी चिर-परिचित ‘मशीनरी’ को फिर से तेल पिलाना शुरू कर दिया है। राजधानी के रवीन्द्र भवन में ‘दीनदयाल प्रशिक्षण महाअभियान’ का आगाज महज एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि इस बात का संकेत है कि भाजपा अब पुराने ढर्रे की राजनीति से ऊब चुकी है और अपने कार्यकर्ताओं को ‘डिजिटल योद्धा’ बनाने की जद्दोजहद में जुट गई है।
मंच पर दिग्गज, रडार पर जमीनी हकीकत
मुख्यमंत्री मोहन यादव, प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल और प्रभारी महेंद्र सिंह की मौजूदगी में शुरू हुआ यह अभियान दरअसल कार्यकर्ताओं की उस ‘वैचारिक जंग’ को धार देने की कोशिश है, जो सोशल मीडिया के दौर में कहीं फीकी पड़ती दिख रही थी। मंच से आह्वान तो सरकार की उपलब्धियों का हुआ, लेकिन अंतर्धारा यह थी कि अगर कार्यकर्ता ने जनता के बीच पैठ नहीं बनाई, तो केवल योजनाओं के भरोसे नाव पार नहीं होगी।
सोशल मीडिया: अब मजबूरी या सबसे बड़ा हथियार?
प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल का यह स्वीकार करना कि ‘बदलते दौर में सोशल मीडिया महत्वपूर्ण है’, भाजपा की उस चिंता को दर्शाता है जहाँ विपक्ष अब डिजिटल मोर्चे पर घेराबंदी तेज कर रहा है।
* प्रशिक्षण का असली मकसद: सिर्फ विचारधारा का पाठ पढ़ाना नहीं, बल्कि आधुनिक संवाद के जरिए विपक्ष के ‘नैरेटिव’ को काटना है।
* डिजिटल फोकस: बंद कमरों में होने वाले इन सत्रों में कार्यकर्ताओं को सिखाया जा रहा है कि कैसे मोबाइल की स्क्रीन से लेकर मोहल्ले की चौपाल तक सरकार का ढिंढोरा पीटना है।
कड़वा सच: पार्टी जानती है कि बिना प्रशिक्षित वक्ताओं के, सरकार की नीतियां फाइलों तक सीमित रह जाती हैं। यह महाअभियान दरअसल उसी ‘कम्युनिकेशन गैप’ को भरने की एक छटपटाहट है।

क्या वाकई सशक्त होगा संगठन?
भाजपा इसे ‘वैचारिक सशक्तिकरण’ कह रही है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे आगामी चुनौतियों के लिए ‘घेराबंदी’ के रूप में देखा जा रहा है। जब सत्ता पास होती है, तो कार्यकर्ता अक्सर निष्क्रिय हो जाते हैं। ऐसे में ‘दीनदयाल प्रशिक्षण’ के बहाने कार्यकर्ताओं को फिर से फील्ड पर उतारने की यह कवायद कितनी सफल होती है, यह आने वाले चुनावों में सोशल मीडिया की फीड और जनता के मिजाज से साफ होगा।










